EPFO ceiling hike : अगर आप प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद काम की है। केंद्रीय कैबिनेट ने नौकरीपेशा कर्मचारियों को बड़ा तोहफा देते हुए EPF और एम्प्लॉई पेंशन स्कीम यानी EPS के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए सैलरी लिमिट को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दिया है। यह नया नियम 17 सितंबर 2026 से लागू हो चुका है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब जिन कर्मचारियों की Basic और DA मिलाकर सैलरी 25 हजार रुपये तक है, उन्हें अनिवार्य तौर पर PF के साथ-साथ पेंशन योजना यानी EPS में भी योगदान देना होगा। कैबिनेट बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने खुद इसकी जानकारी दी और कहा कि इससे कर्मचारियों की सोशल सिक्योरिटी बढ़ेगी।
फैसला क्या है और इसका दायरा कितना बड़ा है?
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक इस फैसले से करीब 51 लाख कर्मचारियों को सीधा फायदा मिलेगा और इसके लिए सरकार को सालाना करीब 11,339 करोड़ रुपये का खर्च उठाना पड़ेगा। मंत्री ने बताया कि यह लंबे समय से चली आ रही मांग थी, जिसे अब पूरा कर दिया गया है। इससे पहले यह सीमा आखिरी बार 1 सितंबर 2014 को बढ़ाई गई थी, जब इसे 6,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये किया गया था। यानी करीब 11 साल बाद इस लिमिट में बदलाव किया गया है। मौजूदा सालाना बजट सहायता करीब 10,250 करोड़ रुपये है, जबकि सरकार का सालाना खर्च करीब 11,339 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया है। अगले पांच सालों में सरकार का अनुमानित कुल खर्च करीब 56,696 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
सैलरी पर कैसे और कितना पड़ेगा असर?
PF में हर महीने कर्मचारी और कंपनी, दोनों मिलकर 12-12 प्रतिशत का योगदान देते हैं। पहले यह योगदान 15,000 रुपये की सीमा पर होता था, यानी 12 प्रतिशत के हिसाब से करीब 1,800 रुपये कटता था। अब यह सीमा बढ़कर 25,000 रुपये होने से 12 प्रतिशत के हिसाब से यह रकम करीब 3,000 रुपये हो जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि कर्मचारी और कंपनी, दोनों तरफ से करीब 1,200 रुपये महीना ज्यादा कटेगा। यह पूरी रकम सीधे आपके PF खाते में जमा होगी। कंपनी के योगदान में से 8.33 प्रतिशत हिस्सा पेंशन यानी EPS के तौर पर जमा किया जाएगा, जबकि बाकी बचा हिस्सा सामान्य PF खाते में जमा होता रहेगा। इस बदलाव से रिटायर होने वाले कर्मचारियों को भविष्य में एक बेहतर और नियमित पेंशन इनकम मिलने की गारंटी बढ़ जाएगी।

| विवरण | पहले | अब |
|---|---|---|
| वेज सीलिंग लिमिट | ₹15,000 | ₹25,000 |
| 12% PF योगदान (एक तरफ से) | ₹1,800 | ₹3,000 |
| अतिरिक्त मासिक योगदान (दोनों तरफ से) | – | ₹1,200 + ₹1,200 |
टेक-होम सैलरी घटने के दो तरीके
एक्सपर्ट्स के मुताबिक कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च को दो तरीकों से हैंडल कर सकती हैं। पहला तरीका यह है कि कंपनी अपनी तरफ से बढ़ा हुआ 1,200 रुपये का खर्च खुद उठा ले और कर्मचारी की सैलरी से भी सिर्फ 1,200 रुपये ही कटें। इस स्थिति में आपकी टेक-होम सैलरी करीब 1,200 रुपये महीना यानी सालाना 14,400 रुपये कम हो जाएगी, लेकिन यह पूरा पैसा आपके PF खाते में ही जमा होगा। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर आलोक अग्रवाल के मुताबिक इससे प्री-टैक्स टेक-होम सैलरी में करीब 1,200 रुपये महीना की कमी आ सकती है। दूसरा तरीका यह है कि कंपनी अपना बढ़ा हुआ खर्च भी कर्मचारी पर डाल दे, जिससे टेक-होम सैलरी से पूरे 2,400 रुपये महीना यानी सालाना 28,800 रुपये तक कट सकते हैं।
दूसरे तरीके में कानूनी अड़चन क्या है?
कानूनी जानकारों का कहना है कि कर्मचारी पर पूरा 2,400 रुपये का बोझ डालने वाला दूसरा तरीका नए लेबर कोड के तहत कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा। सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 की धारा 124 के मुताबिक, नए वेज स्ट्रक्चर पर शिफ्ट होने की वजह से किसी भी कर्मचारी की टेक-होम सैलरी में कमी नहीं आनी चाहिए। इसका मतलब है कि सिर्फ PF का खर्च बढ़ने की वजह से कंपनियां सीधे कर्मचारी की सैलरी से पूरी रकम काटने का फैसला नहीं ले सकतीं, क्योंकि यह कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण माना जाएगा। यही वजह है कि ज्यादातर कंपनियों के लिए पहला विकल्प यानी बढ़ा हुआ खर्च खुद उठाना ही व्यावहारिक रास्ता माना जा रहा है, भले ही इससे कर्मचारी की टेक-होम सैलरी में मामूली कमी आए।
कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर कोई कंपनी कर्मचारी की सैलरी नहीं काटती और खुद ही बढ़ा हुआ PF खर्च उठाती है, तो जाहिर तौर पर उसकी लागत बढ़ जाएगी। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी कर्मचारी का सालाना CTC 20 लाख रुपये है, तो कंपनी को अतिरिक्त 14,400 रुपये सालाना यानी 1,200 रुपये गुणा 12 महीने का खर्च उठाना पड़ सकता है, जिससे उस कर्मचारी का कुल CTC बढ़कर करीब 20.14 लाख रुपये हो जाएगा। कंपनियों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि PF का पूरा फायदा कर्मचारी को रिटायरमेंट के समय मिलता है, जबकि कंपनी को इससे कोई सीधा फायदा नहीं होता। यही वजह है कि बड़ी पेरोल वाली कंपनियों, खासकर जहां हजारों कर्मचारी 25 हजार से कम सैलरी पर काम करते हैं, वहां यह बदलाव आने वाले समय में एक बड़ा वित्तीय मुद्दा बन सकता है।









