उत्तर प्रदेश के 4512 अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में प्रशिक्षित स्नातक यानी टीजीटी के 17740 खाली पदों पर होने वाली नई भर्ती टीईटी को लेकर विवाद में उलझ गई है। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने इन पदों के लिए जो विज्ञापन तैयार किया है, उसमें टीईटी की शर्त को शामिल नहीं किया गया है। यह मामला इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि इससे पहले एलटी ग्रेड यानी सहायक अध्यापक के 7466 पदों की भर्ती में भी ठीक यही मुद्दा उठ चुका है, जिसे कुछ अभ्यर्थियों ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के विज्ञापन के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। यही वजह है कि चयन आयोग अब बिना पूरी स्पष्टता के नया विज्ञापन जारी करने के पक्ष में नहीं है, ताकि दोबारा वैसी ही कानूनी अड़चन खड़ी न हो।
मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में क्या तय हुआ
इस विवाद को सुलझाने के लिए 21 अगस्त को मुख्य सचिव पार्थसारथी सेन शर्मा की अध्यक्षता में एक अहम बैठक हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में आयोग की ओर से माध्यमिक शिक्षा विभाग के अफसरों से साफ तौर पर कहा गया कि नया विज्ञापन जारी करने से पहले टीईटी को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी जाए, ताकि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद अभ्यर्थियों की ओर से फिर कोई कानूनी अड़चन सामने न आए। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले साल 28 जुलाई को भी राजकीय माध्यमिक विद्यालयों से जुड़े इसी विवाद पर चर्चा हो चुकी है, जिससे यह साफ हो जाता है कि टीईटी का यह पेच कोई नया मसला नहीं, बल्कि काफी समय से खिंचता चला आ रहा विवाद है।
कक्षा छह से आठ और नौ-दस के नियमों में अंतर ही असली वजह
इस पूरे विवाद की असली जड़ माध्यमिक विद्यालयों की पढ़ाई के ढांचे में छिपी है। इन स्कूलों में कक्षा छह से लेकर दस तक की पढ़ाई होती है, जबकि एलटी ग्रेड यानी सहायक अध्यापकों की भर्ती मूल रूप से सिर्फ कक्षा नौ और दस में पढ़ाने के लिए की जाती है। व्यवहार में देखा जाए तो यही शिक्षक अक्सर कक्षा छह से दस तक के सभी बच्चों को पढ़ाते हैं, और यहीं से पूरा पेच शुरू होता है। शिक्षा के अधिकार यानी आरटीई के नियमों के मुताबिक कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को पढ़ाने वाले हर शिक्षक के लिए टीईटी पास होना अनिवार्य है, जबकि कक्षा नौ और दस के लिए अब तक यह शर्त लागू नहीं की गई थी। यानी एक ही पद पर नियुक्ति भले ही ऊपर की कक्षाओं के लिए हो रही हो, लेकिन अगर उसी शिक्षक को नीचे की कक्षाओं में भी पढ़ाना पड़े, तो टीईटी की अनिवार्यता खुद-ब-खुद लागू हो जाती है।
हाईकोर्ट में शिक्षा विभाग के हलफनामे ने खड़े किए और सवाल
जब यह मुद्दा एलटी ग्रेड भर्ती के दौरान हाईकोर्ट पहुंचा, तो माध्यमिक शिक्षा विभाग के अफसरों ने अदालत में हलफनामा दाखिल करते हुए एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। विभाग की ओर से कोर्ट में कहा गया कि एलटी ग्रेड के शिक्षकों से सिर्फ कक्षा नौ और दस के बच्चों को ही पढ़वाया जाएगा, उनसे कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को नहीं पढ़वाया जाएगा। इस तरह विभाग ने कागजी तौर पर टीईटी की अनिवार्यता वाले नियम से बचने का प्रयास किया। लेकिन स्कूलों की असल कार्यप्रणाली को समझने वाला हर व्यक्ति यह भी जानता है कि व्यावहारिक रूप से यह अलगाव बनाए रखना आसान नहीं है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर वही शिक्षक निचली कक्षाओं में भी पढ़ाने के लिए लगाए जाते रहे हैं। यही अंतर्विरोध अब टीजीटी भर्ती में भी सिर उठा रहा है।
असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रवक्ता भर्ती पर भी जल्द आ सकता है फैसला
टीजीटी भर्ती में फंसे टीईटी के इस पेच का असर सीधे उन हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है जो लंबे समय से 17740 पदों के विज्ञापन का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि जब तक टीईटी को लेकर नीति साफ नहीं होती, तब तक विज्ञापन जारी होने में देरी बनी रह सकती है। इसी बीच प्रदेश के 330 अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के 2107 पदों और एडेड इंटर कॉलेजों में प्रवक्ता यानी पीजीटी के 2615 पदों पर भर्ती के लिए भी चयन आयोग जल्द विज्ञापन जारी करने की तैयारी में है। मंगलवार को होने वाली आयोग की बैठक में इन दोनों भर्तियों के विज्ञापन के साथ-साथ टीईटी के परिणाम पर भी निर्णय होने की उम्मीद है, जिससे टीजीटी भर्ती में अटके इस पूरे मामले पर भी जल्द स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।









