TET Exemption In-Service Teachers: TET से छूट का इंतजार कर रहे शिक्षकों के लिए लोकसभा में आया जवाब आ गया है देश भर के लाखों उन शिक्षकों के लिए एक नई अपडेट सामने आई है जो लंबे समय से टीईटी यानी टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट से छूट मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे। संसद के मानसून सत्र में लोकसभा में इस मामले को लेकर एक सवाल पूछा गया था, जिसका जवाब केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से दिया गया है। यह जवाब खासतौर पर उन शिक्षकों से जुड़ा है जो टीईटी अनिवार्य होने से पहले ही स्कूलों में नियुक्त हो चुके थे। सवाल यह था कि क्या ऐसे शिक्षकों को नियमों में बदलाव करके राहत दी जाएगी। आगे जानिए पूरा मामला क्या है और सरकार ने इस पर क्या स्टैंड लिया है। आरटीई एक्ट लागू होने से पहले लाखों शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने शिक्षक पात्रता परीक्षा पास नहीं की है और सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद इन शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
दरअसल संसद में सांसद श्री ई तुकाराम ने केंद्र सरकार से सवाल किया था कि क्या टीईटी अनिवार्य होने से पहले नियुक्त हो चुके इन-सर्विस शिक्षकों पर इसका क्या असर पड़ा है, इसका आकलन किया गया है या नहीं। साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या केंद्र सरकार शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 23 में संशोधन कर ऐसे शिक्षकों को राहत देने पर विचार कर रही है, जिन्हें टीईटी अनिवार्यता से पहले नौकरी मिल चुकी थी। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह मामला सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं बल्कि पूरे देश के शिक्षकों से जुड़ा हुआ है, जिसमें कर्नाटक का जिक्र खासतौर पर किया गया।
TET पर केंद्र सरकार का जवाब
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री जयंत चौधरी ने इस सवाल का जवाब देते हुए साफ कर दिया है कि शिक्षा का विषय संविधान की समवर्ती सूची में आता है, यानी शिक्षकों की भर्ती और सेवा शर्तें राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। सीधी बात करें तो केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले में राज्यों पर जिम्मेदारी डाल दी है। इसके साथ ही मंत्री ने यह भी बताया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने फैसले में टीईटी को अनिवार्य योग्यता करार दे चुका है, और केंद्र सरकार की तरफ से इस आदेश के खिलाफ कोई कानूनी बदलाव लाने की योजना नहीं है। यानी जिन शिक्षकों को उम्मीद थी कि संशोधन बिल लाकर छूट दी जाएगी, उनके लिए यह जवाब निराशाजनक साबित हुआ है।
पत्र में क्या-क्या कहा गया पूरी जानकारी
सरकार के जवाब में बताया गया कि टीईटी अनिवार्यता से पहले नियुक्त शिक्षकों का पूरा डेटा राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास ही मौजूद है, केंद्र के पास इसका कोई अलग रिकॉर्ड नहीं है। जवाब में माननीय सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि टीईटी, शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा 23 के तहत न्यूनतम योग्यता है और स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए अनिवार्य है। इसके बाद रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई करते हुए 26 मई 2026 को कोर्ट ने अपने आदेश में टीईटी क्वालिफाई करने की समय-सीमा 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी। साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि टीईटी परीक्षा साल में दो बार, करीब छह महीने के अंतराल पर होनी चाहिए ताकि पात्र शिक्षकों को योग्यता पूरी करने का उचित मौका मिल सके। आप समझ सकते हैं कि यह डेडलाइन बढ़ाना सिर्फ शिक्षकों को थोड़ा और समय देने के लिए है, टीईटी की अनिवार्यता खत्म करने के लिए नहीं। इसके अलावा पत्र की पूरी जानकारी नीचे पीडीएफ में उपलब्ध कराई गई है जहां से पूरी जानकारी देख सकते हैं।
UPTET और CTET लाखों शिक्षक हुए हैं शामिल
वैसे देखा जाए तो टीईटी को लेकर उत्तर प्रदेश में भी हलचल तेज है। यूपी में टीईटी परीक्षा हो चुकी है और उम्मीदवारों को अब रिजल्ट का इंतजार है, जो जल्द जारी होने की संभावना है। उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा का रिजल्ट आने के बाद इन-सर्विस शिक्षकों के लिए एक अलग से विशेष टीईटी कराए जाने पर भी विचार चल रहा है, ताकि जो शिक्षक पहले से कार्यरत हैं उन्हें योग्यता पूरी करने में आसानी हो। वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय स्तर पर होने वाली सीटेट यानी सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट की परीक्षा भी सितंबर महीने में प्रस्तावित बताई जा रही है। इससे यह साफ है कि टीईटी को लेकर आने वाले महीनों में लगातार अपडेट आती रहेंगी, चाहे वह राज्य स्तर की परीक्षा हो या केंद्र स्तर की।
कुल मिलाकर देखा जाए तो लोकसभा में आए इस जवाब ने उन शिक्षकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है जो सोच रहे थे कि सरकार कानून में बदलाव कर उन्हें टीईटी से छूट दे देगी। सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपना रुख साफ कर चुका है और अब केंद्र सरकार ने भी इस मामले में हाथ खड़े कर दिए हैं। ऐसे में जो शिक्षक अभी तक टीईटी क्वालिफाई नहीं कर पाए हैं, उनके पास 2028 तक की समय-सीमा तो जरूर है, लेकिन परीक्षा पास करना अब उनके लिए एक तरह से अनिवार्य ही हो गया है।
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